रविदास (रैदास) — भक्ति संत और समाज सुधारक

संत रविदास की व्यापक मार्गदर्शिका: जीवन, शिक्षाएं, भजन, समाज सुधार की विरासत, रविदास जयंती अनुष्ठान, और भक्ति आंदोलन तथा दलित सशक्तिकरण पर उनका स्थायी प्रभाव।

By Sanatan Hindu3 min readUpdated 10 September 2026Audio available
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Vaishno — Hindu Deity

परिचय

संत रविदास, जिन्हें श्रद्धापूर्वक रैदास भी लिखा जाता है, 15वीं–16वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तर भारतीय भक्ति आंदोलन के सबसे दीप्तिमान व्यक्तित्वों में से एक हैं। उत्तर प्रदेश के वाराणसी के निकट सीर गोवर्धनपुर गांव में एक चमार (पारंपरिक चर्मकार) परिवार में जन्मे, उनका जीवन उस निर्गुण (निराकार दिव्य) भक्ति परंपरा की कट्टर आध्यात्मिक लोकतांत्रिकता को मूर्त करता है जिसने उस युग को परिभाषित किया। हालांकि ऐतिहासिक तिथियां विवादित हैं — विद्वान उनके जन्म को 1377 और 1399 ईस्वी के बीच विभिन्न रूप से रखते हैं, उनकी सक्रिय अवधि कबीर, रामानंद, और प्रारंभिक सिख गुरुओं के साथ ओवरलैप करती है — उनकी आध्यात्मिक प्रामाणिकता हिंदू, सिख, और दलित समुदायों में निर्विवाद है। रविदास को स्वामी रामानंद ने स्वयं रामानंदी संप्रदाय में दीक्षित किया था, उस युग में एक उल्लेखनीय कार्य जब जातिगत बाधाएं आध्यात्मिक दीक्षा को सख्ती से नियंत्रित करती थीं। इस गुरु-शिष्य संबंध ने उन्हें कबीर, सेन, और धन्ना जैसे अन्य महान संतों की प्रत्यक्ष वंशावली में रखा, ऐसी आवाजों का एक नक्षत्र जिसने दिव्य नाम (नाम) और प्रेम भक्ति की सरल, परिवर्तनकारी शक्ति के माध्यम से कर्मकांडीय रूढ़िवाद और जाति पदानुक्रम को चुनौती दी।

महत्व

संत रविदास का आध्यात्मिक महत्व उस धर्मशास्त्र के प्रतिपादन में निहित है जो मोक्ष (मुक्ति) को हर मनुष्य के लिए सुलभ बनाता है, चाहे उसका जन्म, व्यवसाय, या लिंग कुछ भी हो। उनका केंद्रीय रूपक — 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' (man changā to kaṭhautī meṁ gaṅgā), 'यदि मन शुद्ध है, तो चर्मकार के टब में गंगा बहती है' — उनकी क्रांतिकारी आग्रह को समाहित करता है कि आंतरिक शुद्धता बाह्य कर्मकांडीय शुद्धता से परे है। यह शिक्षा सीधे उस ब्राह्मणवादी ढांचे का सामना करती है जो आध्यात्मिक योग्यता को जाति-स्थिति और कर्मकांडीय प्रदर्शन से जोड़ता था। रविदास के पद, जिनमें से इकतालीस गुरु ग्रंथ साहिब (सिख धर्मग्रंथ) में संरक्षित हैं, निर्गुण भक्ति पर बल देते हैं: निराकार, निर्गुण दिव्य (निरंकार, हरि, राम) की भक्ति जो गुरु की कृपा और संतों की संगति (सत्संग) से प्राप्त होती है। उनका 'बेगमपुरा' (बेगमपुरा) — बिना दुख का, बिना कर का, बिना भय का, बिना जाति का नगर — की अवधारणा भारतीय आध्यात्मिक साहित्य की सबसे शक्तिशाली यूटोपियन दृष्टियों में से एक बनी हुई है, जो आदि धर्म आंदोलन से लेकर समकालीन दलित-बहुजन सक्रियता तक पीढ़ियों के समाज सुधारकों को प्रेरित करती है।

कब मनाएं

रविदास जयंती (माघ पूर्णिमा, आमतौर पर जनवरी-फरवरी) विशेष अनुष्ठानों का मुख्य अवसर है। दैनिक स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, विशेष रूप से ब्रह्म मुहूर्त (भोर से पहले) में।

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आवश्यक सामग्री

संत रविदास का चित्र या मूर्ति
गुरु ग्रंथ साहिब या रविदास के भजनों का संग्रह (रविदास बाणी)
ताजे फूल (गेंदा, गुलाब)
अगरबत्ती और धूप
घी का दीया (रुई की बत्ती सहित)
तांबे/कलश के पात्र में स्वच्छ जल
प्रसाद (हलवा, फल, या गुड़-चना जैसा मीठा)
वेदी के लिए स्वच्छ कपड़ा (सफेद या केसरिया)
आरती के लिए घंटी

तैयारी कैसे करें

  1. 1पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें; गंगाजल या स्वच्छ जल छिड़कें।
  2. 2एक ऊंचे मंच (चौकी) पर सफेद या केसरिया स्वच्छ कपड़ा बिछाएं।
  3. 3संत रविदास के चित्र/मूर्ति को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर स्थापित करें।
  4. 4गुरु ग्रंथ साहिब या रविदास बाणी को उनके भजनों पर खोलें (जैसे राग सोरठ, राग गौड़ी)।
  5. 5फूल, धूप, दीप, जल, और प्रसाद को व्यवस्थित ढंग से सजाएं।
  6. 6शुरू करने से पहले दीप और धूप जलाएं।
  7. 7आरामदायक मुद्रा (सुखासन) में वेदी की ओर मुख करके बैठें।
  8. 8गुरु परंपरा का आवाहन करें: श्री गुरु नानक देव जी, श्री गुरु रविदास जी।

कैसे मनाएं

  1. 1तीन गहरी सांसें लें; मन को निराकार दिव्य (निरंकार) पर केंद्रित करें।
  2. 2मूल मंत्र (इक ओंकार सत नाम...) का पाठ कर गुरु की उपस्थिति का आवाहन करें।
  3. 3चम्मच या पंचपात्र से चित्र/मूर्ति को जल (आचमन) अर्पित करें।
  4. 4चित्र के माथे पर चंदन/कुमकुम का तिलक लगाएं।
  5. 5फूल एक-एक कर अर्पित करें, 'ॐ रविदासाय नमः' या 'सतगुरु रविदास जी की जय' का जाप करते हुए।
  6. 6जलते दीप (दिया) को घड़ी की दिशा में घुमाएं (आरती) जबकि रविदास आरती गाएं।
  7. 7गुरु ग्रंथ साहिब से रविदास का कम से कम एक पूरा भजन (शबद) पढ़ें या गाएं (जैसे सोरठ रविदास जी, पृ. 658)।
  8. 8अर्थ पर मनन करें: आंतरिक शुद्धता, समानता, बेगमपुरा दृष्टि।
  9. 9प्रसाद अर्पित करें; उपस्थित सभी में बिना भेद वितरित करें।
  10. 10अरदास (प्रार्थना) के साथ समाप्त करें सार्वभौमिक कल्याण (सरबत दा भला) के लिए।
  11. 11बड़ों के चरण स्पर्श करें; विनम्रता और सेवा (सेवा) के लिए आशीर्वाद लें।

मंत्र

Ravidas's Signature Verse — Man Changa Kathauti Mein Ganga

मन चंगा तो कठौती में गंगा

Man changā to kaṭhautī meṁ Gaṅgā

अर्थ: If the mind is pure, the Ganges flows in the leather-worker's tub — inner purity surpasses external ritual.

Ravidas Shabad in Rag Sorath (Guru Granth Sahib, Ang 658)

रैदास कहै खालसै, हमारै राम राए। जो जन सेवै राम को, तिन्हां कउ नहिं भाए।। बेगमपुरा सहर को नाउ। दुखु अंदोहु नही तिहि ठाउ।। ना तसवीस खिराजु न मालु। खउफु न खता न तरसु जालु।। अब मोहि खूब बतात घर पाउ। खैरि खलक जहां रहै। रैदास खलास चमारा। जो हम सहरी सु मीतु हमारा।।१।।

Raidās kaha'i khālasai, hamārai Rām rāe. Jo jan sevai Rām ko, tinhāṁ kaü nahiṁ bhāe.|| Begampurā sahar ko nāu. Dukh andohu nahi tihi ṭhāu.|| Nā tasvīs khirāj na mālu. Khaüfu na khatā na taras jālu.|| Ab mohi khūb batāt ghar pāu. Khairi khalak jahāṁ rahai. Raidās khalās camārā. Jo ham sahrī su mīt hamārā.||1||

अर्थ: Ravidas says: The Khalsa belongs to our Lord Ram. Those who serve Ram are not bound by fear. Begumpura is the city's name — no sorrow, no anxiety, no taxes, no fear, no error. Now I have found my true home. Ravidas, the liberated chamar, says: whoever is a citizen there is my friend.

Ravidas Aarti (Traditional)

जय रविदास गुरु देव, जय रविदास गुरु देव। भक्तन के हितकारी, दुख हरन सुख देत। चमार कुल में जन्मे, जग में नाम कियो। मन चंगा कठौती गंगा, ज्ञान अमृत पियो।। जय रविदास गुरु देव...

Jai Ravidas Guru Dev, Jai Ravidas Guru Dev. Bhaktan ke hitkārī, dukh haran sukh det. Camār kul meṁ janme, jag meṁ nām kiyo. Man changā kaṭhautī Gaṅgā, jñān amṛt piyo.|| Jai Ravidas Guru Dev...

अर्थ: Victory to Guru Ravidas, benefactor of devotees, remover of sorrow, giver of joy. Born in the chamar family, he made his name in the world. 'Mind pure, Ganges in the tub' — he drank the nectar of knowledge. Victory to Guru Ravidas.

Mool Mantar (Invocation before Ravidas Bani)

इक ओंकार सतनाम करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि।

Ik Onkār Sat Nām Kartā Purakh Nirbhau Nirvair Akāl Mūrat Ajūnī Saibhaṁ Gur Prasād.

अर्थ: One Universal Creator God, Truth is His Name, Doer of all, Fearless, Without enmity, Timeless form, Unborn, Self-existent, Realized by Guru's Grace.

पालन के नियम

  • रविदास जयंती पर कई भक्त सात्विक व्रत (केवल फल/दूध) रखते हैं जब तक शाम की पूजा न हो जाए।
  • अनुष्ठान के दिन शराब, मांस, प्याज, लहसुन से परहेज करें।
  • उनके भजन पढ़ते समय एक अवधि के लिए मौन (मौन) रखें।
  • सेवा (लंगर, सफाई, जरूरतमंदों की मदद) को व्रत के हिस्से के रूप में करें।
  • दूसरों की आलोचना न करें; उस समानता का अभ्यास करें जो रविदास ने सिखाई।

करें

  • रविदास के भजनों को समझ और हार्दिक भक्ति के साथ पढ़ें/पाठ करें।
  • लंगर/सेवा के दौरान सभी प्रतिभागियों के साथ समान व्यवहार करें — कोई जाति/लिंग आधारित बैठक पृथक्करण नहीं।
  • सामाजिक समानता और आंतरिक शुद्धता पर उनकी शिक्षाओं को युवा पीढ़ियों के साथ साझा करें।
  • रविदासिया समुदाय की संस्थाओं (डेरों, स्कूलों, अस्पतालों) का समर्थन करें।
  • यदि संभव हो तो सीर गोवर्धनपुर (वाराणसी) या स्थानीय रविदास मंदिर के दर्शन करें।

न करें

  • रविदास जयंती को बिना आध्यात्मिक चिंतन के केवल सांस्कृतिक उत्सव न मानें।
  • प्रसाद वितरण या बैठक में भेदभाव न करें — यह उनके मूल संदेश का विरोधाभास है।
  • उनकी निर्गुण भक्ति को केवल सगुण मूर्ति-पूजा अनुष्ठानों से न जोड़ें।
  • जाति-उत्पीड़न के संदर्भ को स्वीकार किए बिना उनकी विरासत का विनियोग न करें।
  • गुरु ग्रंथ साहिब को उनकी बाणी के प्राथमिक पाठ्य घर के रूप में उपेक्षित न करें।

सामान्य गलतियाँ

  • 'रविदास' का उच्चारण भारी 'व' के साथ 'रविदास' के रूप में करना — सही है कोमल 'व' (रविदास)।
  • यह मान लेना कि उन्होंने एक अलग धर्म स्थापित किया — हिंदू, सिख, और रविदासिया धर्म समान रूप से उन्हें अपना मानते हैं।
  • रामानंद के अधीन उनकी प्रत्यक्ष शिष्यता और कबीर से संबंधों को नजरअंदाज करना।
  • इस तथ्य को अनदेखा करना कि उनके 41 भजन गुरु ग्रंथ साहिब में हैं, किसी अलग ग्रंथ में नहीं।
  • 'बेगमपुरा' को केवल रूपक मानकर उसकी सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से न जुड़ना।

क्षेत्रीय विविधताएँ

  • पंजाब: भव्य जुलूस (नगर कीर्तन), रविदास बाणी का निरंतर अखंड पाठ, रविदास डेरों पर विशाल लंगर (जैसे डेरा सचखंड बल्लां)।
  • उत्तर प्रदेश (वाराणसी/सीर गोवर्धनपुर): जन्मस्थान की तीर्थयात्रा, विशेष मेला, गंगा पर नाव यात्रा करते हुए उनके पदों का पाठ।
  • महाराष्ट्र: मातंग और महार समुदायों द्वारा मनाया जाता है; अंबेडकरवादी बौद्ध उत्सवों के साथ एकीकृत।
  • प्रवासी (यूके, कनाडा, यूएसए): रविदास सभाएं कीर्तन, जाति समानता पर संगोष्ठी, युवा शिविर आयोजित करती हैं।
  • रविदासिया धर्म (2009 से अलग पहचान): अपना ग्रंथ (अमृत बाणी), गुरु वंशावली, अलग विवाह रीति।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या रविदास हिंदू संत थे या सिख संत?
रविदास सिख धर्म के औपचारिक संस्थागतीकरण से पूर्व के हैं लेकिन उनके भजनों को गुरु अर्जन देव जी ने गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल किया। वे सिख धर्म में भगत के रूप में पूजे जाते हैं, हिंदू परंपरा में संत के रूप में, और रविदासिया धर्म के संस्थापक गुरु के रूप में। उनका सार्वभौमिक संदेश संप्रदायिक लेबलों से परे है।
बेगमपुरा क्या है?
बेगमपुरा (बेगमपुरा) — 'बिना दुख का नगर' — रविदास की दूरदर्शी आदर्श समाज की अवधारणा है: न कर, न भय, न जाति पदानुक्रम, न कष्ट। यह उनके राग सोरठ के पद में आता है (गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 658) और आधुनिक जाति-उन्मूलन आंदोलनों को प्रेरित करता है।
रविदास दलित सशक्तिकरण के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?
एक चमार संत के रूप में जिन्होंने अपने वंशानुगत व्यवसाय में रहते हुए सर्वोच्च आध्यात्मिक प्रामाणिकता प्राप्त की, रविदास इस सत्य को मूर्त करते हैं कि जाति आध्यात्मिक योग्यता निर्धारित नहीं करती। उनका जीवन और पद दलित-बहुजन स्वाभिमान आंदोलनों की नींव हैं, जिसमें आदि धर्म और रविदासिया धर्म शामिल हैं।
रविदास जयंती कैसे मनाई जाती है?
माघ पूर्णिमा (जनवरी-फरवरी) को भक्त नगर कीर्तन, उनकी बाणी का अखंड पाठ, लंगर, सामाजिक न्याय पर संगोष्ठी आयोजित करते हैं, और सीर गोवर्धनपुर, वाराणसी में उनके जन्मस्थान मंदिर के दर्शन करते हैं। यह दिन कई भारतीय राज्यों में राजपत्रित अवकाश है।
क्या गैर-दलित रविदास की पूजा कर सकते हैं?
बिल्कुल। रविदास का संदेश सार्वभौमिक है: 'रविदास खलास चमारा, जो हम सहरी सु मीत हमारा' — 'मुक्त चमार रविदास कहते हैं: जो कोई बेगमपुरा का नागरिक है, वह मेरा मित्र है।' उनका मार्ग उन सभी के लिए खुला है जो आंतरिक शुद्धता और समानता चाहते हैं।

संदर्भ और पारंपरिक टिप्पणियाँ

  • गुरु ग्रंथ साहिब: रविदास के 41 भजन राग सोरठ, गौड़ी, आसा, धनासरी, आदि में (अंग 658, 694, 733, 1106, 1293)।
  • भक्तमाल (नाभादास, लगभग 1585 ईस्वी) और भक्तिरस बोधिनी (प्रियादास, 1712 ईस्वी) — प्रारंभिक हागियोग्राफिक विवरण।
  • परकाई (हागियोग्राफिक कविताएं) अनंतदास द्वारा (लगभग 1600 ईस्वी) — विस्तृत जीवन कथाएं।
  • अमृत बाणी गुरु रविदास जी — रविदासिया धर्म का विहित ग्रंथ (20वीं शताब्दी में संकलित)।
  • विद्वतापूर्ण कार्य: कालेवर्ट और फ्रीडलैंडर (1992), 'द लाइफ एंड वर्क्स ऑफ रैदास'; लोरेंजेन (1995), 'भक्ति रिलीजन इन नॉर्थ इंडिया'; जुर्गेंसमेयर (1982), 'रिलीजन एज सोशल विजन'।

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