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Epic Vishnu Darshan

Complete lyrics with original text, transliteration, and meaning, 9 sections

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viShNu-purANa-taylor

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Original

मैंने अवतार लिया जब धरा भी धर्म विरुद्ध हो जाता था मैंने अवतार लिया जब मनुष्य पुण्य विमुख हो जाता था मैंने सब तार दिया वो साधु संत जो तप पे सटे हुए उन सब पर वार किया जो जीवन धर्म के पथ से हटे हुए अब जब संसार के सागर में सुख ढूंढ रहे कुछ दबे यही कुछ हुए विफल जो मारे गए कुछ हुए विफल जो रुके नहीं कुछ देख रहे क्या हुआ चक्र में हुआ वही जो रचा गया कुछ खोज रहे क्या मिला अंत पर अंत सभी को मिला नहीं वो वेद मुझी से निकले हैं जो गाए मुझी को शब्दों में वो वेद मुझी को भजते हैं हर कल्प युगों के चक्रों में उन वेद का सार भी मैं ही हूं जीवन आहार भी मैं ही हूं भौतिक संसार भी मैं ही हूं तू तर्क क्या ढूंढता अर्थों में यह स्पष्ट वत्स मुझ में ही यह जीवन का बीज पनपता है यह स्पष्ट वत्स मुझ में ही वो चूहा अग्नि का जलता है यह स्पष्ट मुझी में पुण्य भोग और पाप कर्म भी पलता है फल काल मृत्यु संग अंत सभी का मेरे समक्ष ही खिलता है

Verse 2

Original

जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे हो भक्त जनों के संकट दास जनों के संकट क्षण में दूर करे जय जगदीश हरे

Verse 3

Original

सतयुग का संघर्ष हुआ जब वेद विद्य का खंड हुआ हैग्रीव छुपा था मृत्युलोक में युगों का अंत अखंड हुआ मैं मत्स्य रूप सर मुकुट धरे कर शंख चक्र और पद्म मैंने अवतार लिया जब भूमि सजल सम्राट मनु भी धन्य हुए वो मैं ही था जब कुर्म बन के पर्वत के भार को सादा था वो मैं ही था जब मोहिनी ने अमृत देवों में बांटा था मोहलिया सभी को क्षण में मैंने और असुरों का सर काटा था मेरे समक्ष सब देव आए जब बचाना कोई चारा था हिरण्याक्ष ने तप के बल पे ब्रह्मा से वरदान लिए जब धरा बहा दी जल में उसने देव आदि पर वार किए वो मैं ही था जो सूकर बन के धरा नाम से आया था हिरण्याक्ष को तार मैंने दांतों से धरा को लाया था मुख मेरा चारों ओर सखा तू जहां भी देखे मैं ही हूं मैं वायु बन के साथ तेरे और जल का स्वाद भी मैं ही हूं मैं मिट्टी की सुगंध सखा धरती की हर एक गंध में हूं मैं विधि वेद सब यज्ञ में ही विद्या के हर एक छंद में हूं

Verse 4

Original

जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे हो भक्त जनों के संकट दास जनों के संकट क्षण में दूर करे जय जगदीश हरे

Verse 5

Original

उग्रम में और वीरम में महाविष्णु अवतार में ही ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् चारों ओर प्रकाश में ही नृसिंहं भीषणं भद्रं भय और हित का स्रोत में ही मृत्यु का मैं स्वामी सखा मृत्यु का सत्य रूप में ही मैं एक पग में धरती को नाप और दूसरे में ब्रह्मांड सदा जब तीसरे को ना स्थान मिला तो देख रूप चरणों में गिरा वामन के रूप में मैं ही था जो देख मुझे ना जान सका राजा बली का मैं मान तोड़ गिर गया वहीं सर चरण रखा वो मैं ही था इक्कीस बार धरती को मुक्त कराया था मैं हाथ में फरसा लेके चला ब्रह्मांड विजय दिलाया था वो मैं ही था जो पहचाना क्षत्रियकाल के नाम से ही भयभीत मेरे सब नाम से थे भयभीत धनुष टंकार से ही हां मैं ही हूं वो सास सखा जिसके द्वारा जीवन तेरा मेरे द्वारा ही प्राण सखा चाहूं छीनू जीवन तेरा अब देख मुझी को कण कण में उस समय चक्र के क्षण क्षण में मैं हर कहीं पे विख्यात सखा और मैं ही पालन हार तेरा

Verse 6

Original

जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे हो भक्त जनों के संकट दास जनों के संकट क्षण में दूर करे जय जगदीश हरे

Verse 7

Original

मैं सहज सुशीला धर्मवीर दशरथ का नंदन राम भी हूं मैं सुंदर सा मुस्काने वाला सीता का मैं प्राण भी हूं उस कामवान और दुष्ट असुर उस रावण का मैं काल भी हूं भक्ति रस में जीवन बिताते उन संतों का कल्याण भी हूं मैं हल चला के योद्धा कहाया मैं हलधार बलराम भी हूं मैं मुरली संग उधम मचाया मैं गिरधर सुंदर श्याम भी हूं मैं कली काल के रूप में दुर्योधन आदि का काल भी हूं मैं अर्जुन के कानों में पढ़ता गीता का गुणगान भी हूं मैं मुकुट धरे तलवार लिए कलकी के रूप में आऊंगा मैं ही आऊंगा स्वयं सखा जब धर्म को हटते पाऊंगा मैं कली काल का अंत करू ये युग भी जान ले मेरा है मैं असुरों का संघार करूं मेरे ही पास सवेरा है जब युगों युगों में हानि हो और धर्म भी हो जब चूर सखा जब दुख की वर्षा करने पर नीति भी हो मजबूर सखा मैं तब तब स्वयं ही आया हूं भक्तो का तारण करने को आऊंगा मैं हर बार सखा सब दुख निवारण करने को

Verse 8

Original

जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे जय जगदीश हरे हो भक्त जनों के संकट दास जनों के संकट क्षण में दूर करे जय जगदीश हरे

Verse 9

Original

"हम ऐसे हरि के दास बने जिनकी लीला हर बार कहू जो अनंत शेष पे है स्थित उनकाअनंत गुणगान कहूं मैं दास सिद्धार्थ पड़ा चरणों उनके अनंत अवतार कहूं मैं अंत मेंकरता दंडवत पर बारंबार प्रणाम कहू"

Siddharth Sharma

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